Tuesday, 20 November 2012

विकोसशील देशों में 10 प्रतिशत से ज्यादा दवाएं नकली


14-11-12 05
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूटीओ) के मुताबिक विकासशील देशों में बिक रही 10 प्रतिशत दवाएं या तो नकली हैं या फिर घटिया स्तर की हैं।
 
डब्ल्यूटीओ के मुताबिक सबसे ज्यादा नकली दवा मलेरिया के उपचार के लिए बिकने वाली दवाओं के रूप में हैं क्योंकि एशिया और अफ्रीका के ज्यादातर हिस्से में इस बीमारी का सर्वाधिक प्रकोप है इसलिए इसके उपचार की दवाओं की यहां सबसे ज्यादा मांग है।
 
डब्ल्यूटीओ के मुताबिक विकासशील देशों के साथ ही नकली दवाओं के कारोबार का खतरा विकसित देशों में भी कम नहीं है। फार्मा कंपनी रोश की ओर से कैंसर के उपचार के लिए बनाई गई सबसे प्रभावी दवा एवास्टीन की नकल हाल ही में अमेरिकी बाजार से बडी संख्या में जब्त की गई है। इसके अलावा मिनिंजाइटिस के उपचार के लिए लगाए जाने वाले स्टेरायड इंजेक्शन भी बडी संख्या में यहां नकली पाए गए हैं।
 
यूरोपीय संघ की बात करें तो यहां जब्त की जाने वाली नकली वस्तुओं में भी सबसे बडी संख्या नकली दवाओं की ही है। हैरानी की बात यह है कि जो नकली दवाएं मिल रही हैं उनमें सैनोफी एली लिलि और एस्ट्राजेनेका जैसी नामी गिरामी दवा कंपनियों के नाम का इस्तेमाल किया जा रहा है।
 
भारत का आरोप है कि उसके यहां बनने वाली जेनेरिक यानी कि सस्ती जीवन रक्षक दवाओं से मिल रही कडी प्रतिस्पर्धा को देखते हुए विदेशी मुल्कों की सरकारें अपने यहां की दवा कंपनियों को शह दे रही हैं और इसी कारण बाजार में नकली दवाओं का कारोबार फल फूल रहा है। यही वजह है कि भारत ने अगले सप्ताह ब्यूनस आयर्स में इस मसले पर डब्ल्यूटीओ की प्रस्तावित बैठक में दवा कंपनियों की भागीदारी पर सख्त एतराज किया है। ब्राजील ने भी इस मामले में भारत का समर्थन किया है।

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